श्री सुंदरकांड श्री रामचरितमानस का पांचवां कांड है, जिसमें हनुमानजी की लंका यात्रा, सीताजी से मुलाकात, अशोक वाटिका में विनाश और लंका दहन का वर्णन है। यह कांड भक्तों को संकट से मुक्ति और हनुमानजी की कृपा प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम माना जाता है।
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
श्रीगुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन-रूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुनाथजी के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फलों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को देने वाला है।
🕉️ सुंदरकांड का आरंभ
१
त्रिभुवन प्रभु राम सिय राम।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
हे त्रिभुवन के प्रभु श्री राम और सीताजी के राम! हे कपीश्वर हनुमान! आप तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।
२
नील नीरद सुंदर तनु सोहा।
बज्र अंगार कपि राज कहोहा।।
हनुमानजी का शरीर नीले बादल के समान सुंदर है और वज्र के समान दृढ़ है। वे वानरों के राजा कहलाते हैं।
३
अति मODERATE बल बुद्धि बिधाता।
नीति निपुन नायक सुब्राता।।
हनुमानजी अत्यंत बल, बुद्धि और विद्या के स्वामी हैं। वे नीति में निपुण और सुंदर गुणों वाले नायक हैं।
४
राम काज कीन्हें बिनु मोहि।
कहा बिस्राम अमित अति तोहि।।
हे हनुमान! श्री राम का कार्य किए बिना आपको कहाँ विश्राम मिल सकता है? आप अत्यंत महान हैं।
🌊 समुद्र पार करना
५
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
जामवंतजी के मधुर वचन सुनकर हनुमानजी के हृदय में अत्यंत प्रसन्नता हुई।
६
तब लगि मोहि परिखा अब कीन्ही।
सठ तजि मोहि अनुअहित लीन्ही।।
हे हनुमान! तब तक आपने मेरी परीक्षा ली, अब मुझ मूर्ख को छोड़कर अपनी अनुकंपा दीजिए।
७
तात मोर मुख परिखा तेरी।
देखउं तव पौरुष बड़ि भारी।।
हे तात! मेरी यह परीक्षा आपके मुख से है। मैं आपका अत्यंत विशाल पराक्रम देखना चाहता हूं।
८
तब हनुमान कपि सन माना।
राम काजु अति निज प्रान समाना।।
तब हनुमानजी ने वानरों के सामने मान लिया कि श्री राम का कार्य मेरे प्राणों के समान प्रिय है।
९
चलेउ हनुमंत संकट मोचन।
रघुनाथ काजु लागत सोचन।।
संकट मोचन हनुमानजी चल पड़े। श्री रघुनाथजी के कार्य में लगने के लिए वे विचार करने लगे।
१०
गिरि तरि तरि तरु तरि जलधि जाहीं।
जेहिं जासु जसु जग जसु माहीं।।
जो पर्वतों और वृक्षों को लांघकर समुद्र को पार कर जाते हैं, जिनका यश जगत में प्रसिद्ध है।
🏔️ मैनाक पर्वत पर विश्राम
११
मैनाक पर्वत तहाँ बसाई।
तहाँ हनुमान बिस्राम कराई।।
वहाँ मैनाक पर्वत पर हनुमानजी को विश्राम कराया गया।
१२
तहाँ सुरसा नाम अहि माता।
बोलीं बचन नीति रति साथा।।
वहाँ सुरसा नामक नागमाता ने नीति और प्रेम से युक्त वचन कहे।
१३
मोहि खाइबे आवत पाए।
तुम्हरो बल बुद्धि मैं पाए।।
मैं आपको खाने आई हूं, परंतु आपका बल और बुद्धि मैंने पहचान ली है।
१४
तब हनुमान ताहि सिख दीन्हा।
मोहि सुरसा तव मन कीन्हा।।
तब हनुमानजी ने उन्हें समझाया — हे सुरसा! मैंने आपका मन जान लिया है।
१५
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि।
नहिं अघात तव मुख सोहि।।
श्री राम का कार्य किए बिना मैं आपके मुख में नहीं जाऊंगा, यह आपके लिए शोभा नहीं देगा।
🌺 लंका में प्रवेश
१६
नगर निवासी दच्छिनहू तेही।
बिप्र बेस धरि कीन्ह प्रबेसा।।
हनुमानजी ने दक्षिण दिशा से नगर में प्रवेश किया और ब्राह्मण का वेश धारण किया।
१७
सोहत बिप्र बेस बन आए।
सुंदर नगर निवास सुहाए।।
ब्राह्मण के वेश में हनुमानजी अत्यंत सुंदर लग रहे थे और नगर के निवासी भी सुहाने लगे।
१८
रावन राज नगर सुहावन।
सपनहूँ नहिं जाइ बखानन।।
रावण का राज्य नगर अत्यंत सुहावना था, जिसका वर्णन स्वप्न में भी नहीं किया जा सकता।
१९
सोन कसक कसक कसकाई।
सोहत नगर सिरोपर सोहाई।।
सोने की कसक (झिलमिलाहट) से नगर सिर पर सुशोभित हो रहा था।
२०
नगर निवासी नर नारि सोहहिं।
सुर नर मुनि सid्ध सब मोहहिं।।
नगर के निवासी पुरुष और स्त्रियां सुंदर लग रहे थे। देवता, मनुष्य, मुनि और सिद्ध सब मोहित हो रहे थे।
🌳 अशोक वाटिका में सीताजी
२१
अशोक बाटिका देखी सोहा।
बैठीं जहाँ जनकसुता मोहा।।
हनुमानजी ने अशोक वाटिका देखी, जहाँ जनकनंदिनी सीताजी बैठी हुई थीं।
२२
त्रिजटा सो सचिव सयानी।
रहइ सदा साथ सिय जानी।।
त्रिजटा नामक सचिव सयानी थी, जो सदा सीताजी के साथ रहती थी।
२३
सोहत सीता सोक समाही।
राम बिरह अनल जनु जाही।।
सीताजी शोक में डूबी हुई सुंदर लग रही थीं, मानो श्री राम के वियोग की अग्नि में जल रही हों।
२४
देखत हनुमंत हृदय बिसारी।
तातेम प्रेम बस मन मारी।।
हनुमानजी ने सीताजी को देखकर हृदय में विचार किया और प्रेमवश मन में दुख महसूस किया।
२५
बैठीं भूमि पर सोक समाहीं।
तन कृसानि सीस जट नाहीं।।
सीताजी भूमि पर बैठी हुई शोक में डूबी थीं, शरीर कृश (दुबला) हो गया था और सिर पर जटाएं नहीं थीं।
💍 सीताजी को अंगूठी दिखाना
२६
तब हनुमान मन माहिं बिचारी।
कहउं कवन मति कीन्हि बिसारी।।
तब हनुमानजी ने मन में विचार किया — मैं किस मति से बात कहूं, जो सीताजी को विश्वास हो?
२७
रामचंद्र के चरन पखारी।
तिन्हहि कीन्हि प्रभु मुद्रिका धारी।।
श्री रामचंद्रजी ने अपने चरण धोकर सीताजी को यह अंगूठी (मुद्रिका) दी थी।
२८
तब हनुमंत मुद्रिका देखाई।
बोले बचन मधुर मन भाई।।
तब हनुमानजी ने मुद्रिका दिखाई और मधुर वचन बोले, जो मन को भाए।
२९
जनकसुता सुनहु मम बानी।
रामचंद्र गुन ग्राम नidानी।।
हे जनकनंदिनी! मेरी बात सुनो। श्री रामचंद्रजी के गुणों का भंडार हूं मैं।
३०
दसरथ नंदन रघुकुल तिलक।
मोहि सुमिरन करहु मन मिलक।।
दशरथजी के नंदन, रघुकुल के तिलक श्री राम — उनका मन में मिलकर स्मरण करो।
🔥 लंका दहन
३१
तब हनुमान पवनसुत कीन्ही।
बात बिचारि मन माहिं सरीन्ही।।
तब पवनपुत्र हनुमानजी ने मन में विचार करके यह बात सोची।
३२
मोहि कहा बैदेहि बखानी।
जौं नहिं मिलिहि तौं मारहिं प्रानी।।
मुझे वैदेही (सीताजी) को क्या कहूं? अगर नहीं मिलीं तो प्राण त्याग दूंगा।
३३
तब लंका पुरी सब जारी।
भवन बिभीषन के उबारी।।
तब हनुमानजी ने लंका पुरी को जला दिया, केवल विभीषणजी के भवन को बचाया।
३४
अगिनि सन कहेउ हनुमाना।
सुनहु पवनसुत मोहि निदाना।।
हनुमानजी ने अग्नि से कहा — हे पवनपुत्र! मुझे निदान (शांति) दो।
३५
तब अगिनि सन कहेउ सुहाई।
सीताहि देखि पावक सिधाई।।
तब अग्नि ने सुहाई बात कही — सीताजी को देखकर मेरी शांति हुई।
🌊 वापसी और रामजी से मुलाकात
३६
चलेउ हनुमंत संकट मोचन।
रघुनाथ काजु लागत सोचन।।
संकट मोचन हनुमानजी चल पड़े। श्री रघुनाथजी के कार्य में लगने के लिए विचार करते हुए।
३७
राम कहा सुनहु कपि बानी।
सीताहि देखि कीन्हि सुहानी।।
श्री राम ने कहा — हे वानर! मेरी बात सुनो। सीताजी को देखकर क्या सुहाना (अच्छा) किया?
३८
तब हनुमंत मुद्रिका देखाई।
राम हृदय प्रेम अति छाई।।
तब हनुमानजी ने मुद्रिका दिखाई। श्री राम के हृदय में अत्यंत प्रेम छा गया।
३९
राम बोले बचन मन भाए।
हनुमान तुम्हरि महिमा गाए।।
श्री राम ने मन को भाए हुए वचन बोले — हे हनुमान! तुम्हारी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है?
४०
तुम्हरो यश गावैं सुर नर मुनि।
सिद्ध नाग असुर दनुज भुनि।।
तुम्हारा यश देवता, मनुष्य, मुनि, सिद्ध, नाग, असुर और दानव सब गाते हैं।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
हे पवनपुत्र! आप संकट हरण करने वाले और मंगलमय मूर्ति हैं। श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।
🙏 सुंदरकांड पाठ के फायदे
- 🛡️ संकट मोचन: सभी भय, संकट और कष्ट दूर होते हैं
- 💪 बल और साहस: शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि
- 🧠 बुद्धि विकास: मन एकाग्र, बुद्धि तेज और निर्णय क्षमता बढ़ती है
- 🏥 रोग मुक्ति: गंभीर बीमारियों से छुटकारा और स्वास्थ्य लाभ
- 👻 भूत-प्रेत से बचाव: नकारात्मक शक्तियों, बuri नज़र और डर से सुरक्षा
- 🎯 सिद्धि प्राप्ति: जीवन के सभी कठिन कार्य सफल होते हैं
- 😌 मानसिक शांति: चिंता, तनाव, अवसाद और डर पूर्ण रूप से दूर
- 🌟 कृपा प्राप्ति: हनुमानजी और श्री राम की अपार कृपा
- ⚖️ कोर्ट-कचहरी: कानूनी मामलों में विजय और न्याय प्राप्ति
- 💰 धन-संपत्ति: आर्थिक संकट दूर और समृद्धि
📿 पाठ की विधि
- 🌅 सुबह: स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पाठ करें
- 🪷 आसन: लाल या पीले रंग का आसन बिछाएं
- 🕉️ दीप: घी का दीप जलाएं, धूप बताएं और फूल चढ़ाएं
- 🙏 प्रसाद: बूंदी के लड्डू, केला या गुड़ का प्रसाद रखें
- 📖 पाठ: एकाग्र चित्त से पूरा सुंदरकांड पढ़ें
- 🎵 कीर्तन: पाठ के बाद "हनुमान चालीसा" और "हरे राम" जपें
- 🔄 नियमितता: रोज़ाना, मंगलवार या शनिवार को पाठ करें
- 🕉️ संकल्प: पाठ से पहले संकल्प लें कि किस कार्य के लिए पाठ कर रहे हैं
बजरंग बली की जय!
जय श्री राम!
🙏
🎯 निष्कर्ष
श्री सुंदरकांड केवल एक काव्य अंश नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और मुक्ति का अमृत मार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसे ऐसी रचा कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी इसे पढ़कर भगवान हनुमान और श्री राम की कृपा प्राप्त कर सकता है। चाहे आप संकट में हों, रोग से ग्रस्त हों, मानसिक शांति चाहते हों, या जीवन के किसी भी कठिन कार्य में सफलता पाना चाहते हों — सुंदरकांड का पाठ सब कुछ ठीक कर देता है।
🙏 जय श्री राम 🙏
⚔️ जय बजरंगबली ⚔️
🕉️ हं हनुमते नमः 🕉️